ब्रेकिंग दुखद न्यूज़: उत्तराखंड के प्रख्यात आंदोलनकारी नेता फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट का निधन

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हरिद्वार:  उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के अग्रणी नेताओं में से एक, उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के संस्थापक और पूर्व कैबिनेट मंत्री फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट का आज शाम लगभग 4:30 बजे हरिद्वार स्थित उनके निजी निवास (शिवलोक के निकट) में निधन हो गया। वे 79 वर्ष के थे और काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर से पूरे उत्तराखंड में शोक की लहर दौड़ गई है।

मुख्यमंत्री और राज्यपाल ने जताया गहरा शोक

​दिवंगत नेता के सम्मान में, उत्तराखंड के राज्यपाल और मुख्यमंत्री सहित राज्य के कई गणमान्य व्यक्तियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है।

स्वास्थ्य और अंतिम समय

दिवकार भट्ट पिछले 10 दिनों से देहरादून के इंद्रेश अस्पताल में भर्ती थे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी हाल ही में अस्पताल जाकर उनका हाल-चाल जाना था।

‘फील्ड मार्शल’ की उपाधि और आंदोलन में भूमिका

​दिवकार भट्ट उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के एक प्रमुख और जुझारू योद्धा थे। राज्य निर्माण में उनकी प्रभावशाली भूमिका और लंबे संघर्ष को देखते हुए जनता ने उन्हें सम्मानपूर्वक ‘फील्ड मार्शल’ की उपाधि से नवाजा था। उन्हें उन अग्रणी आंदोलनकारियों में गिना जाता है जिनके अथक प्रयासों से ही उत्तराखंड राज्य का निर्माण संभव हो सका।

राजनीतिक करियर और मंत्रिपद

  • पहला चुनाव: उत्तराखंड राज्य बनने के बाद, उन्होंने 2002 में गढ़वाल मंडल के कीर्ति नगर विधानसभा क्षेत्र से पहला चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
  • मंत्रिपद: 2007 के विधानसभा चुनाव में, वह कीर्ति नगर से विधायक चुने गए। इसके बाद वे 2007 से 2012 तक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। उन्होंने भुवन चंद्र खंडूरी और रमेश पोखरियाल निशंक, दोनों मुख्यमंत्रियों के मंत्रिमंडल में कार्य किया।
  • अन्य चुनाव: 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों में उन्हें फिर से हार मिली। वे अपने जीवनकाल में केवल एक बार ही उत्तराखंड विधानसभा के सदस्य रहे।

निजी जीवन का दुखद पहलू

​2002 में कीर्ति नगर से चुनाव हारने के बाद उनकी पत्नी को इतना गहरा सदमा लगा था कि उन्होंने सल्फास की गोली खाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी, जो उनके निजी जीवन का एक अत्यंत दुखद अध्याय रहा।

​फील्ड मार्शल दिवाकर भट्ट का निधन उत्तराखंड की राजनीति और राज्य निर्माण आंदोलन के इतिहास में एक युग का अंत माना जा रहा है।