स्वर्ण जयंती पार्क: सिमटता सुकून और दरकती मर्यादा

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– त्रिलोक चंद भट्ट

भूमिका और इतिहास

33 साल पहले (1993) बीएचईएल हरिद्वार द्वारा निर्मित स्वर्ण जयंती पार्क कभी क्षेत्र का गौरव हुआ करता था। बुजुर्गों की सैर, बच्चों की हंसी और परिवारों के मेल-मिलाप के लिए बना यह विशाल पार्क आज अपनी पहचान और गरिमा बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

वर्तमान संकट: अश्लीलता और कुप्रबंधन

प्रशासन की अनदेखी और सुरक्षा में चूक के कारण यह सार्वजनिक स्थल अब प्रेमी युगलों और रील बनाने वाले युवाओं के ‘अड्डा’ के रूप में चर्चा में है। यहाँ की स्थिति अब ऐसी है कि:

  • पारिवारिक असहजता: सार्वजनिक स्थानों पर बढ़ती अश्लीलता और आपत्तिजनक हरकतों के कारण सभ्य परिवारों और बुजुर्गों ने यहाँ से दूरी बना ली है।
  • रखरखाव का अभाव: न तो पौधों की छंटाई समय पर होती है और न ही साफ-सफाई का कोई उचित प्रबंध बचा है।
  • बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप: स्थानीय निवासियों के बजाय सिडकुल और आसपास की निजी कॉलोनियों से आने वाले लोगों के कारण पार्क का मूल स्वरूप बिगड़ रहा है।

प्रशासनिक उदासीनता

पुलिस गश्त की कमी और बीएचईएल प्रशासन की सुस्ती ने असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद कर दिए हैं। रील संस्कृति और सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने निजता और शांति को पूरी तरह भंग कर दिया है।

सुधार के लिए आवश्यक कदम

पार्क की गरिमा बहाल करने के लिए कुछ ठोस उपाय अनिवार्य हैं:

  1. कड़ी निगरानी: शाम के समय ‘एंटी-रोमियो स्क्वाड’ और महिला पुलिस कर्मियों की तैनाती।
  2. नियमों की सख्ती: आपत्तिजनक व्यवहार पर भारी जुर्माने और सख्त चेतावनी बोर्डों की स्थापना।
  3. एंट्री मैनेजमेंट: पहचान पत्र की जांच और प्रवेश शुल्क लागू कर बाहरी तत्वों की अनियंत्रित भीड़ को कम करना।