बहस : विश्वसनीयता की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं एक्जिट पोल

अब तो सभी मीडिया (प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक) फलौदी सट्टा बाजार के अनुमानों को महत्व देकर प्रसारित करते या छापते हैं- भूपेन्द्र गुप्ता

वैसे तो एग्जिट पोल भारतीय चुनावी परिदृश्य को दो दशक से प्रभावित करते रहे हैं। किंतु 2023 के ताजा एग्जिट पोल सामने आने के बाद विरोधाभास की स्थिति पैदा हो गई है देश के एक प्रतिष्ठित चैनल के प्रतिष्ठित पत्रकारों ने ही अपने चैनल पर प्रसारित किये जा रहे एग्जिट पोल से असहमति जाहिर कर दी,और इसे सार्वजनिक भी कर दिया। तब एग्जिट पोल की विश्वसनीयता पर पूरे देश में बहस शुरू हो गई है ।
क्या एग्जिट पोल वास्तविकता के नजदीक होते हैं ? क्या एग्जिट पोल में वैज्ञानिक प्रक्रियाओं का उपयोग होता है ? क्या एग्जिट पोल भौगोलिक रूप से संपूर्ण क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं ? या इसमें कल्पनाशीलता का भी रंग होता है ।
सन 2013 में जिन भी संस्थाओं ने चुनाव के बाद अपने एग्जिट पोल जारी किए थे उनमें इंडिया टुडे ने मध्य प्रदेश में भाजपा को 138 और कांग्रेस को 80 सीटें बताई थी जबकि चुनाव के वास्तविक परिणाम सामने आए तो भाजपा को 165 और कांग्रेस को मात्र 58 सीट ही मिली थी ।इसका अर्थ यह है कि परिणाम विश्वास योग्य नहीं थे।इसी तरह 2013 के राजस्थान चुनाव के लिए इस कंपनी ने भाजपा को 110 और कांग्रेस को 62 सीटें दी थीं जबकि वास्तविक परिणाम में भाजपा को 163 एवं कांग्रेस को मात्र 21 सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। इसी तरह 2018 में अगर देखा जाए तो एक्सेस माय इंडिया ने 2018 में मध्य प्रदेश के लिए भाजपा को 111 और कांग्रेस को 113 सीटों की घोषणा की थी वास्तविक परिणाम में यह भाजपा को 109 और कांग्रेस को 114 सीट प्राप्त होने से माना जाने लगा कि इनका एग्जिट पोल सर्वाधिक सही था लेकिन इसी कंपनी द्वारा 2018 में ही राजस्थान में किये गये सर्वेक्षण में भाजपा को 63 और कांग्रेस को 130 सीट बताई गई थीं जबकि वास्तविक परिणाम में भाजपा को 73 और कांग्रेस को 99 सीट प्राप्त हुई थीं।इसका अर्थ है कि एक ही संस्था द्वारा एक ही तरह की प्रणाली का उपयोग करके किए गए सर्वे के परिणाम भी भिन्न-भिन्न हो सकते हैं और उसमें किसी एक राज्य में एक्यूरेसी होने के बावजूद भी वह अन्य राज्य या भौगोलिक क्षेत्र में असफल भी हो सकता है ।
फिर विभिन्न पार्टियां जानते हुए भी इन एग्जिट पोलों को महत्व क्यों देतीं हैं ?क्योंकि इन पोल के माध्यम से मनोवैज्ञानिक वातावरण बनाने में वे पोल के परिणामों का उपयोग करती हैं ।जिससे अधिकारियों पर भी दबाव बनता है और प्रतिपक्षियों के कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। सामान्यतःजो सीटें 500 से 1000 मतों के बीच में फंसी हुई होती हैं उन्हें सत्ताधारी पार्टी दबाव बनाकर अपने अनुकूल परिणाम लाने में सफलता हासिल कर सकती है ।यह संभावना ही इन सर्वेक्षणों को महत्व मिलने का मूल आधार है। 2018 के चुनाव में इस तरह फंसी हुई लगभग 20 सीटें ही सरकार का संख्याबल घटाने-बढ़ाने में सहायक हुईं थीं, अन्यथा 2018 में ही बहुमत की सरकार अपेक्षित थी।
ऐसे सर्वेक्षणों में सेम्पल साईज,सेम्पल की ज्योग्राफिक लोकेशन,और ईमानदार विश्लेषण ही इसकी विश्वसनीयता की कसौटी होती है।उदाहरण के लिये एक हजार सेम्पल अगर एक ही लोकेशन से संग्रहीत कर लिये जायें जबकि क्षेत्र में 300 बूथ है तब भी सेम्पल साईज तो एक हजार ही कहलायेगी किंतु वह समग्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करेगी।इसलिये सेम्पल यूनीवर्स का चयन ही सर्वेक्षित क्षेत्र की विविधताओं का प्रतिनिधित्व कर सकता है।इसी तरह केवल एक मुद्दे को आधार बनाकर उसका प्रभाव जांचा जाये तब भी परिणाम संधिग्ध ही होंगे।ताजा सर्वेक्षण लाड़ली बहना सापेक्ष प्रतीत होते हैं और वे तिरस्कृत बहनाओं,मंहगाई, बेरोजगारी, किसान समस्याओं, आदिवासी अस्मिता ,ओपीएस तथा शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों की उपेक्षा करते दिखाई देते हैं।
भारत में जबसे आनलाइन गेमिंग पर 28 फीसदी जीएसटी लगाकर पीछे के रास्ते सट्टा या खापबाजी को नियमित करने की कोशिश हुई है, तबसे ऐसे सर्वेक्षणों को सट्टेबाजी में सहायक भूमिका निभाने का अवसर भी मिला इससे इनकार नहीं किया जा सकता।अब तो सभी मीडिया (प्रिंट अथवा इलेक्ट्रानिक) फलौदी सट्टा बाजार के अनुमानों को महत्व देकर प्रसारित करते या छापते हैं।यह वृत्ति सट्टे को सामाजिक मान्यता दिलाने की चेष्टा है।जबकि सट्टा एक अपराध है।छोटी-छोटी पर्ची काटकर सट्टा खिलाने वाले तो देश में अपराधी कहलाते हैं जबकि ऐसी सूचनाओं या सर्वेक्षणों को हम सम्भावनाओं का विश्लेषण मानकर उपेक्षा करते हैं।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सटोरिये इन सूचनाओं का उपयोग करते हैं और दांव लगाने वाले अधिकाश लोग लुटते हैं। जबकि सभी जानते हैं कि जुआ ही महाभारत का कारण था और आज संभावनाओं के आधार पर प्रत्याशी का गलत चयन गरीबी और मंहगाई के दुष्चक्र का !
जहां तक एग्जिट पोल का सवाल है पुराने कई अनुभव और नतीजे देखे गये हैं जिसमें यह पूरी तरह से फ्लॉप हुए हैं। दूसरा सबसे बड़ा सवाल यह है कि जितने चैनल उतने ही अलग-अलग राग और आलाप । ऐसे में किस पर विश्वास करें और किस पर नहीं? कई बार लगता है कि वह कहीं प्रायोजित तो नहीं? कई बार साफ लगता है कि किसी दल विशेष या किसी प्रत्याशी विशेष को फायदा पहुंचाने की दृष्टि से बताए या दिखाए जाते हैं। एग्जिट पोल के नतीजे को लेकर हर कहीं एक सनसनी या एंजायटी या एक बदहवासी सी स्थिति बन जाती है जो कि अच्छी नहीं है। इसलिए खबरिया चैनलों की इस प्रायोजित मनमानी को पूरी तरह से रोका जाना जनहित में होगा।
क्या चुनाव आयोग को इस पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगा देना चाहिए?(विनायक फीचर्स)