वैदिक काल से चली आ रही लोक परंपरा छठ महापर्व का हरिद्वार में उत्साहपूर्ण माहौल में समापन हो गया। यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है, लेकिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को पड़ने वाला छठ सर्वाधिक लोकप्रिय है।
छठ महापर्व के तीसरे दिन सोमवार को श्रद्धालुओं ने गंगा घाटों पर ‘डूबते सूर्य’ (सांध्य अर्घ्य) को नमन किया। मंगलवार को ‘उगते सूर्य’ (प्रातः अर्घ्य) को अर्घ्य देने के साथ ही महापर्व का समापन हुआ। धर्म नगरी हरिद्वार के हरकी पौड़ी, प्रेम नगर आश्रम, गंगनहर बहादराबाद और अन्य सभी घाटों पर बड़ी संख्या में छठ प्रेमियों का जमावड़ा लगा रहा।
छठ पूजा, जिसका संबंध महाभारत और रामायण काल से भी बताया जाता है, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश (पूर्वांचल) का सबसे बड़ा लोकपर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से सूर्य देव (जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य के देवता) और उनकी बहन छठी मैया (संतान की रक्षा और दीर्घायु प्रदान करने वाली देवी) की उपासना का पर्व है।
श्रद्धालुओं ने 36 घंटे से अधिक का निर्जला व्रत रखकर शारीरिक और मानसिक शुद्धिकरण किया। यह पर्व साधना, सादगी पर जोर देता है और प्रकृति, जल एवं नदी के महत्व को दर्शाता है। इस दौरान प्राकृतिक और धार्मिक आहार का सेवन किया गया, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का प्रतीक है। पूर्वांचल उत्थान संस्था और अन्य कई समितियों द्वारा घाटों पर व्यापक प्रबंध किए गए थे।













