HRDA की कार्यशैली पर उठे सवाल: जनहित ताक पर, जनप्रतिनिधियों के बिना ‘बेलगाम’ हुआ विभाग

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हरिद्वार।  प्रदेश के विकास और आम जनता को सुव्यवस्थित सुविधाएं देने के उद्देश्य से गठित ‘हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण’ (HRDA) इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर विवादों के घेरे में है। उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के नेताओं ने विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि प्राधिकरण अपने मूल सिद्धांतों—’जनता का, जनता के लिए और जनहित’—से पूरी तरह भटक चुका है।

लोकतंत्र गायब, अफसरशाही का बोलबाला

यूकेडी नेता गोकुल सिंह ने शासन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि पिछले कई वर्षों से प्राधिकरण बिना किसी जनप्रतिनिधि के चल रहा है। लोकतांत्रिक ढांचे में विकास प्राधिकरणों के बोर्ड में स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी अनिवार्य होती है ताकि जनता की समस्याओं और जरूरतों को नीति-निर्धारण में जगह मिल सके। लेकिन HRDA में लंबे समय से यह पद रिक्त पड़े हैं, जिससे विभाग केवल अधिकारियों की इच्छाशक्ति पर निर्भर होकर रह गया है।

भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों के आरोप

समाचार के अनुसार, स्थानीय निवासियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि विभाग अब जनहित के कार्यों को संपन्न कराने के बजाय जनता के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। आरोप हैं कि:

  • नक्शा पास कराने की जटिलता: आम आदमी के लिए अपने घर का नक्शा पास कराना टेढ़ी खीर बन गया है।(जनप्रतिनिधियों के अभाव में विभाग के कैंप भी बेसर हो रहे हैं)
  • अवैध निर्माण पर चयनात्मक कार्रवाई: छोटे निर्माणों पर सख्ती दिखाई जाती है, जबकि बड़े रसूखदारों के अवैध निर्माणों पर आंखें मूंद ली जाती हैं।
  • संवादहीनता: जनप्रतिनिधियों के अभाव में आम जनता की शिकायतों को सुनने वाला कोई नहीं है।