ऋषिकेश: स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का प्रतीक है। उन्होंने वर्तमान में तकनीक, भौतिकता और उपभोग की मानसिकता से मानव चेतना के विभाजन पर चिंता व्यक्त की। स्वामी चिदानन्द ने प्रकृति, संस्कृति और संतति के संरक्षण के लिए मिलकर कदम उठाने का आह्वान किया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान जैसे संकटों को केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि दार्शनिक और नैतिक प्रश्न बताया। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को ब्रह्मांडीय संतुलन (‘ऋत’) के रूप में देखा गया है, और पर्यावरण की रक्षा अब आध्यात्मिक कर्तव्य है। संस्कृति आत्मा को शुद्ध करती है, समाज को एकजुट करती है और जगत को संतुलित रखती है। ‘धर्म’ का अर्थ कर्तव्य और दायित्व है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण प्रमुख है। हमें पृथ्वी को अगली पीढ़ी से उधार के रूप में देखना चाहिए। पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान समग्र दृष्टिकोण से ही संभव है, जिसमें प्रकृति, संस्कृति और संतति अभिन्न रूप से जुड़े हैं। केवल बाहरी प्रयासों से नहीं, बल्कि आंतरिक रूपांतरण और चेतना के जागरण से ही प्रकृति की रक्षा, संस्कृति की पुनर्स्थापना और भविष्य का निर्माण संभव है।
2025-04-17













