परमार्थ निकेतन में पर्यावरण संरक्षण पर कार्यशाला: सनातन संस्कृति और प्रकृति के सह-अस्तित्व पर जोर

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हरिद्वार: परमार्थ निकेतन में आज पर्यावरण संरक्षण के विषय पर एक महत्वपूर्ण कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का शुभारंभ परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती, जाने-माने पर्यावरणविद् गोपाल आर्य और देशभर से आए शिक्षाविदों, पर्यावरण प्रेमियों तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कार्यकर्ताओं की गरिमामयी उपस्थिति में दीप प्रज्वलित करके हुआ।
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने RSS को भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों की रक्षा के लिए समर्पित एक प्रेरणादायक संस्था बताया, जो भारत के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। उन्होंने कहा कि RSS पिछले 100 वर्षों से निःस्वार्थ भाव से समाज के हर वर्ग तक सेवा, संस्कार और स्वाभिमान का संदेश पहुंचा रहा है। स्वामी जी ने पर्यावरण की रक्षा को केवल एक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि हमारा धर्म बताया। उन्होंने पंचभूतों (धरती, जल, वायु, अग्नि और आकाश) को अपने जीवन में अपनाने और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के भारतीय सांस्कृतिक संदेश का पालन करने का आह्वान किया। युवाओं को प्रेरित करते हुए उन्होंने प्रकृति संरक्षण को अपने जीवन का मिशन बनाने और प्लास्टिक मुक्त जीवन, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और जैविक कृषि जैसे प्रयासों को अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने ‘यूज एंड थ्रो’ की संस्कृति से ‘यूज एंड ग्रो’ की ओर बढ़ने की आवश्यकता पर बल दिया।
पर्यावरणविद् गोपाल आर्य ने अपने संबोधन में कहा कि सनातन संस्कृति में प्रकृति को देवतुल्य माना गया है, लेकिन आधुनिक जीवनशैली ने इसे केवल उपयोग की वस्तु बना दिया है, जिसके कारण आज पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है। उन्होंने वैदिक काल में भूमि को माता, जल को जीवन और अन्न को देवता मानने की प्राचीन परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्तमान में हमने इन्हें क्रमशः प्रॉपर्टी का टुकड़ा, नल का पानी और खाने की वस्तु मान लिया है, जो हमें अपनी समृद्ध संस्कृति से दूर कर रहा है। श्री आर्य ने ‘उपयोग’ से आगे बढ़कर ‘उपासना’ की ओर लौटने और लोगों में प्रकृति के प्रति गहरी संवेदना और श्रद्धा जागृत करने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि पर्यावरण संरक्षण एक व्यापक जन आंदोलन बन सके।
कार्यशाला के समापन पर, देशभर से आए सभी प्रतिभागियों ने अपने-अपने शिक्षण संस्थानों और समुदायों में पर्यावरण संरक्षण को जन-जन का आंदोलन बनाने का दृढ़ संकल्प लिया, ताकि एक हरित, स्वच्छ और संतुलित भारत की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकें।
इस महत्वपूर्ण अवसर पर शिक्षण संस्थान के अखिल भारतीय प्रमुख डॉ. अनिल और भारत के सभी प्रांतों के प्रमुख कार्यकर्ता भी उपस्थित थे। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य सनातन संस्कृति में निहित प्रकृति के गहन महत्व को पुनर्जीवित करना और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को एक शक्तिशाली जन आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाना रहा, जिसमें स्वामी चिदानन्द सरस्वती और गोपाल आर्य के विचारों ने प्रतिभागियों को नई ऊर्जा और दिशा प्रदान की।